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सेवक गायब, अधिकारी हावी: यूपी प्रशासन पर बड़ा सवाल।

अधिकारी बनाम सेवक: यूपी की नौकरशाही और जनता का टूटता रिश्ता

अधिकारी बनाम सेवक: यूपी की नौकरशाही, सत्ता और जनता का टूटता रिश्ता

आम चर्चा विशेष | लखनऊ डेस्क

उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा आयोग के अध्यक्ष पद पर एक रिटायर्ड नौकरशाह की नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह उस सोच का प्रतीक है जिसमें लोकतंत्र से अधिक नौकरशाही पर भरोसा किया जा रहा है।

भूमिका: एक नियुक्ति, कई सवाल

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और राजनीतिक रूप से निर्णायक राज्य में जब शिक्षा सेवा आयोग जैसे संवैधानिक महत्व के संस्थान की जिम्मेदारी एक रिटायर्ड अफसर को सौंप दी जाती है, तो सवाल केवल योग्यता का नहीं रहता, बल्कि मंशा और दृष्टि का बन जाता है।

दिल्ली में संघ–बीजेपी की समन्वय बैठकों में यह स्पष्ट संदेश दिया गया था कि उत्तर प्रदेश में रिक्त पड़े सैकड़ों पदों पर संगठन, विचार परिवार और योग्य कार्यकर्ताओं को स्थान दिया जाना चाहिए। स्वयं प्रदेश के मुखिया ने इस दिशा में आश्वासन भी दिया था।

लेकिन प्रशांत कुमार की नियुक्ति ने उस आश्वासन को कमजोर कर दिया है। यह संदेश गया है कि प्रदेश की नीति और नियति आज भी नौकरशाही के हाथों में है।

नौकरशाही का बढ़ता वर्चस्व

भारतीय लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है कि सरकार जनता की सेवक होती है। लेकिन व्यवहार में स्थिति उलट दिखाई देती है। नीति निर्माण से लेकर क्रियान्वयन तक, हर जगह अफसरशाही का दबदबा है।

“अधिकारी खुद को लाट साहब से कम नहीं समझते, और जनता को याचक बना दिया गया है।”

अदालतों की फटकारें, मीडिया की सुर्खियाँ और राजनीतिक बयानबाज़ी—इन सबके बावजूद ज़मीनी सच्चाई नहीं बदलती। अफसर वही रहते हैं, रवैया वही रहता है।

क्या मुख्यमंत्री विवश हैं?

यह सवाल आम जनता के बीच गूंज रहा है—क्या प्रदेश का मुखिया दबाव में है? क्या निर्णय कहीं और लिए जा रहे हैं? या फिर यह प्रशासनिक सुविधा का रास्ता है?

जो भी कारण हो, परिणाम स्पष्ट है—जनता और कार्यकर्ता हाशिये पर हैं।

शिक्षा सेवा आयोग का प्रतीकात्मक महत्व

शिक्षा सेवा आयोग केवल नियुक्तियों की संस्था नहीं है। यह तय करता है कि आने वाली पीढ़ी को शिक्षक कैसे मिलेंगे, शिक्षा का स्तर क्या होगा और समाज किस दिशा में जाएगा।

ऐसे संस्थान के शीर्ष पर रिटायर्ड अधिकारी की नियुक्ति यह दर्शाती है कि सरकार को न तो शिक्षाविदों पर भरोसा है और न ही समाज पर।

अदालत की फटकार: औपचारिकता या समाधान?

अदालतों ने समय-समय पर नौकरशाही की मनमानी पर सवाल उठाए हैं। लेकिन सत्ता के संरक्षण में ये फटकारें अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती हैं।

लाट साहब संस्कृति की वापसी

ब्रिटिश शासन में जिलाधिकारी को कलेक्टर कहा जाता था—शासक, कर वसूलने वाला। आज़ादी के 75 साल बाद भी वही मानसिकता जारी है, बस चेहरा बदल गया है।

अधिकारी हर जगह, सेवक कहीं नहीं

ग्राम सेवक का नाम बदलकर ग्राम विकास अधिकारी कर दिया गया। खंड स्तर पर अधिकारी, जिला स्तर पर अधिकारी, राज्य स्तर पर अधिकारी।

तो सवाल उठता है—सेवा कौन कर रहा है? और जनता किस पायदान पर खड़ी है?

गंगा उल्टी बह रही है

जहाँ कभी सबसे नीचे सेवक होता था, वहाँ भी अधिकारी है। और जहाँ जवाबदेही होनी चाहिए थी, वहाँ अहंकार दिखाई देता है।

समाधान: नाम नहीं, सोच बदलनी होगी

सरकार को साहसिक निर्णय लेने होंगे—

  • जिलाधिकारी → जिला सेवक
  • खंड विकास अधिकारी → खंड सेवक
  • मुख्य विकास अधिकारी → मुख्य विकास सेवक

यह केवल पदनाम का परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि प्रशासनिक सोच में बदलाव की शुरुआत होगी।

कार्यकर्ताओं और विषय विशेषज्ञों को अवसर

आयोगों और बोर्डों में शिक्षाविद, डॉक्टर, समाजसेवी और योग्य कार्यकर्ताओं को स्थान दिया जाना चाहिए। रिटायर्ड अफसर समाधान नहीं, बल्कि अस्थायी सुविधा हैं।

जनता का स्थान तय करना होगा

लोकतंत्र में जनता सबसे ऊपर होती है। लेकिन मौजूदा ढांचे में जनता केवल आवेदन, शिकायत और वोट बनकर रह गई है।

“जब अधिकारी राजा बन जाएँ और जनप्रतिनिधि मौन हो जाएँ, तब लोकतंत्र केवल काग़ज़ पर बचता है।”

चेतावनी और अवसर

उत्तर प्रदेश आज एक मोड़ पर खड़ा है। या तो वह सेवा आधारित प्रशासन की ओर जाएगा, या फिर नौकरशाही के वर्चस्व में और गहराएगा।

इतिहास उन सरकारों को याद रखता है जो समय रहते चेतावनी समझ लेती हैं।

✍️ आम चर्चा | लखनऊ डेस्क
जनता, लोकतंत्र और सत्ता के बीच संवाद का प्रयास

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