विशेष रिपोर्ट: अफ़गानिस्तान–पाकिस्तान सीमा पर छिड़ी भीषण जंग, क्या सुलझ पाएगा डूरंड लाइन का विवाद?
तारीख: 28 फरवरी, 2026 | डेस्क रिपोर्ट: आम चर्चा
अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के बीच का तनाव अब केवल सीमा पर होने वाली झड़पों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह एक खुले सैन्य संघर्ष की शक्ल ले चुका है। फरवरी 2026 के आख़िरी सप्ताह में शुरू हुई इस लड़ाई ने पूरे दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने इसे आधिकारिक रूप से “खुली जंग जैसी स्थिति” बताया है, जबकि तालिबान शासित अफ़गानिस्तान ने अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए किसी भी स्तर तक जाने का संकेत दिया है।
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| Pak-Afgan war |
इस टकराव की जड़ में पाकिस्तान द्वारा अफ़गान सीमा के भीतर किए गए हवाई हमले बताए जा रहे हैं। इस्लामाबाद का दावा है कि नंगरहार और खोस्त प्रांतों में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के ठिकानों को निशाना बनाया गया। पाकिस्तान लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि अफ़गानिस्तान की धरती का इस्तेमाल उसके खिलाफ आतंकी हमलों के लिए किया जा रहा है और तालिबान सरकार इन गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रख पा रही।
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पाकिस्तानी हवाई हमलों के तुरंत बाद अफ़गान तालिबान ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। सीमा से सटे इलाकों में भारी आर्टिलरी और रॉकेट लॉन्चरों की तैनाती की गई। अफ़गान रक्षा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, बदरी 313 और ओमारी जैसी विशेष लड़ाकू इकाइयों को पाकिस्तान सीमा पर अग्रिम मोर्चों पर भेज दिया गया है। इसके बाद तोरखम और चमन सेक्टर में लगातार गोलाबारी और रॉकेट हमलों की खबरें सामने आईं।
ग्राउंड रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस संघर्ष में दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। पाकिस्तानी वायुसेना के हमलों में अफ़गानिस्तान के कई सैन्य डिपो और प्रशिक्षण केंद्र नष्ट हुए हैं, जिनमें 270 से अधिक तालिबान लड़ाकों के मारे जाने का दावा किया जा रहा है। दूसरी ओर, अफ़गान तालिबान की जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान की लगभग 19 सीमा चौकियां क्षतिग्रस्त हुई हैं और 55 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों की मौत की खबर है।
इस पूरे संघर्ष का सबसे भयावह पहलू आम नागरिकों की त्रासदी है। तोरखम और चमन जैसे सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले कम से कम 18 नागरिकों की जान जा चुकी है, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। लगातार हो रही गोलाबारी और बमबारी के कारण हजारों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो गए हैं और सुरक्षित इलाकों की ओर पलायन कर रहे हैं।
युद्ध का असर अब केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है। अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के बीच के प्रमुख व्यापारिक रास्ते — तोरखम और चमन — पूरी तरह बंद कर दिए गए हैं। ताज़े फल, सब्जियां, दवाइयां और जरूरी सामान से लदे हज़ारों ट्रक सीमा के दोनों ओर फंसे हुए हैं। इससे करोड़ों रुपये का व्यापार प्रभावित हुआ है और दोनों देशों की पहले से जर्जर अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है।
पाकिस्तान द्वारा अफ़गान शरणार्थियों की वापसी की प्रक्रिया पहले ही दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट घोल चुकी थी। अब इस युद्ध ने मानवीय संकट को और गहरा कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे तो सीमा क्षेत्रों में गंभीर खाद्य और स्वास्थ्य संकट पैदा हो सकता है।
मौजूदा हालात में दोनों देशों की सेनाएं हाई अलर्ट पर हैं। कतर, संयुक्त राष्ट्र और कुछ क्षेत्रीय शक्तियां मध्यस्थता की कोशिश कर रही हैं, लेकिन ज़मीनी हालात फिलहाल किसी नरमी के संकेत नहीं दे रहे। डूरंड लाइन का वही पुराना विवाद, जिसे अफ़गान तालिबान ऐतिहासिक रूप से कभी स्वीकार नहीं करता, एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव का कारण बन गया है।
आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि यह संघर्ष सीमित सैन्य टकराव बनकर थमता है या फिर दक्षिण एशिया को एक नई और खतरनाक अस्थिरता की ओर धकेल देता है। फिलहाल सीमा पर बारूद की गंध और अनिश्चितता का साया गहराता जा रहा है।




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