Ticker

6/recent/ticker-posts

Ad

बड़ी कार्रवाई: यूपी बीजेपी में जातीय गोलबंदी पर ब्रेक!

यूपी बीजेपी में जातीय बैठकों पर रोक: देर से सही, लेकिन ज़रूरी पहल

यूपी बीजेपी में जातीय बैठकों पर रोक: देर से सही, लेकिन ज़रूरी पहल

✍️ आम चर्चा | लखनऊ डेस्क  |  📅 28 दिसंबर 2025
0

उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष द्वारा हाल में जातीय बैठकों पर नाराज़गी जताते हुए उन्हें रोकने संबंधी बयान बिल्कुल सही दिशा में उठाया गया कदम है। भले ही यह पहल देर से आई हो, लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह एक आवश्यक हस्तक्षेप था।

यह बात अलग है कि पार्टी को यह संदेश काफी पहले देना चाहिए था। परंतु यह अपेक्षा करना कि भूपेंद्र चौधरी जैसे अपेक्षाकृत कमजोर संगठनात्मक नेता इस स्तर की राजनीतिक स्पष्टता दिखा पाते—शायद यथार्थ से परे था।

बीजेपी में घटता जातीय संतुलन और उसका चुनावी असर

पिछले कई वर्षों से भारतीय जनता पार्टी में ठाकुर, ब्राह्मण और पिछड़ा वर्ग के बीच आपसी तालमेल धीरे-धीरे कमजोर हुआ है। इसका सीधा असर 2024 के लोकसभा चुनावों में देखने को मिला, जहाँ पार्टी को अपेक्षा से अधिक नुकसान उठाना पड़ा।

चुनावी विशेषज्ञ मानते हैं कि इस नुकसान के पीछे विकास या राष्ट्रवाद से अधिक जातीय असंतुलन और तथाकथित जातीय रहनुमाओं के आपसी टकराव की बड़ी भूमिका रही।

2022 के संकेत और गहराती विसंगति

2022 के विधानसभा चुनावों में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की हार को लेकर भी ऐसी ही चर्चाएँ सामने आई थीं। कई जानकारों का मानना है कि गोरखपुर की जातिवादी राजनीति धीरे-धीरे पूरे उत्तर प्रदेश में फैलती चली गई।

पूर्वांचल और अवध क्षेत्र में ब्राह्मण–ठाकुर संघर्ष कोई नई घटना नहीं है। आज़ादी के बाद से यह अलग-अलग रूपों में सामने आता रहा है।

इसकी सबसे ताज़ा मिसाल तब देखने को मिली जब योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी सांसद सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा के ब्राह्मण प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा।

बाद में यह विसंगति कौशांबी में 2022 के विधानसभा चुनाव में केशव मौर्य की हार के साथ और व्यापक होकर प्रदेशव्यापी बहस का विषय बन गई।

योगी आदित्यनाथ, नेतृत्व और अंदरूनी चुनौतियाँ

यह कहना आवश्यक है कि योगी आदित्यनाथ स्वयं जाति आधारित राजनीति नहीं करते। लेकिन संयोगवश उनके अधिकांश राजनीतिक विरोधी अलग-अलग जातीय पृष्ठभूमि से आते रहे हैं।

समय-समय पर पार्टी और सरकार के भीतर नेतृत्व को लेकर चुनौती देने की कोशिशें होती रही हैं—और हर बार योगी आदित्यनाथ ने उन्हें राजनीतिक रूप से पीछे हटने पर मजबूर किया है।

पार्टी के भीतर यह भी कहा जाता है कि योगी जी के समर्थक विधायक और नेता सीमित संख्या में हैं। इस असंतुलन को ठीक करने की कोशिश वे लगातार करते रहे हैं।

कुटुंब और सहभोज: पुरानी राजनीति का नया चेहरा

हाल के दिनों में ‘कुटुंब’ नाम से ठाकुर विधायकों की बैठक और ‘सहभोज’ नाम से ब्राह्मण विधायकों की बैठक—दरअसल उसी पुरानी जातिवादी राजनीति का विद्रूप स्वरूप हैं।

केंद्र की भाजपा आलाकमान को यह स्थिति भली-भांति ज्ञात है। इसी कारण ऐसा ओबीसी चेहरा प्रदेश अध्यक्ष के रूप में आगे किया गया जो न योगी खेमें का है, न केशव मौर्य के।

पंकज चौधरी का बयान: दोनों खेमों को साफ संदेश

पंकज चौधरी केवल उस भाजपा विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सामाजिक समरसता पर आधारित है।

पद संभालते ही जातीय बैठकों के खिलाफ दिया गया उनका बयान भले ही दिखावे में ब्राह्मण सहभोज के संदर्भ में हो, लेकिन उसका अंतर्निहित संदेश पहले हुई ठाकुर बैठकों के लिए भी उतना ही स्पष्ट है।

2027 की राजनीति और अखिलेश की रणनीति

आगामी विधानसभा चुनावों में अखिलेश यादव भाजपा पर इसी मुद्दे को लेकर हमलावर होने वाले हैं कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है, आपसी टकराव है और सरकार पर जातीय पक्षपात के आरोप हैं।

भाजपा ने इस बयान के ज़रिये इन संभावित आरोपों के खिलाफ पहली रक्षात्मक पहल शुरू कर दी है।

निष्कर्ष: देर से सही, पर दिशा सही

अब पार्टी को अपनी पोज़िशनिंग सुधारनी होगी, पब्लिक परसेप्शन को सकारात्मक बनाना होगा और योगी सरकार के चाल, चेहरा और चरित्र को दुरुस्त करते हुए 2017 जैसी रणनीति पर दोबारा काम करना होगा।

इस दृष्टि से देखा जाए तो भाजपा ने अपने कील-कांटे और चेहरे को दुरुस्त करने की कवायद शुरू कर दी है। यह देर से उठाया गया कदम है, लेकिन सही दिशा में है—और इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

नोट: व्यक्तिगत रूप से मेरी दिली इच्छा है कि 2047 तक भारत में सत्ता का नेतृत्व व्यापक रूप से ओबीसी और वंचित वर्गों के हाथों में आए। फिर भी समस्त हिंदू जातियों के प्रतीक के रूप में भगवाधारी योगी आदित्यनाथ का स्वागत है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ