बांग्लादेश का आम चुनाव 2026 केवल सत्ता परिवर्तन की एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उस लंबे राजनीतिक तनाव, सामाजिक असंतोष और लोकतांत्रिक संघर्ष का परिणाम है जो पिछले डेढ़ दशक से देश के भीतर सुलग रहा था।
यह चुनाव बांग्लादेश की राजनीति के लिए एक ऐसे मोड़ के रूप में सामने आया है, जहाँ जनता ने पहली बार खुलकर यह संकेत दिया कि स्थिरता के नाम पर लोकतांत्रिक स्पेस का संकुचन अब स्वीकार्य नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की वापसी को केवल एक पार्टी की जीत के रूप में नहीं, बल्कि एक दबे हुए राजनीतिक प्रवाह के पुनः उभार के रूप में देखा जा रहा है।2009 के बाद से बांग्लादेश की सत्ता पर अवामी लीग का लगभग निर्विवाद वर्चस्व रहा। इन वर्षों में देश ने बुनियादी ढांचे, ऊर्जा परियोजनाओं और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में उल्लेखनीय प्रगति की, लेकिन इसके समानांतर चुनावी निष्पक्षता, विपक्ष की भूमिका और संस्थानों की स्वायत्तता पर लगातार सवाल भी खड़े होते गए। चुनाव दर चुनाव यह धारणा मजबूत होती चली गई कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया धीरे-धीरे औपचारिकता में बदलती जा रही है।
मीडिया पर दबाव, डिजिटल कानूनों का कठोर इस्तेमाल और विपक्षी आंदोलनों पर सख्ती ने एक ऐसा माहौल बनाया, जहाँ असहमति को देशद्रोह की तरह देखा जाने लगा। इसी माहौल में बीएनपी का राजनीतिक सफर लगभग अस्तित्व की लड़ाई में तब्दील हो गया था। पार्टी नेतृत्व पर कानूनी और राजनीतिक दबाव, संगठनात्मक ढांचे को कमजोर करने की कोशिशें और लंबे समय तक चुनावी प्रक्रिया से बाहर रहना—इन सबने बीएनपी को हाशिये पर धकेल दिया।
इसके बावजूद पार्टी का जमीनी नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। ग्रामीण इलाकों, पुराने समर्थक वर्ग और स्थानीय स्तर पर बीएनपी की राजनीतिक स्मृति जीवित रही। 2024 और 2025 के दौरान जब देशभर में विरोध प्रदर्शनों और जन असंतोष ने आकार लेना शुरू किया, तब बीएनपी एक बार फिर लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की आवाज के रूप में उभरने लगी।
इस पूरे घटनाक्रम में तारिक रहमान का नाम लगातार केंद्र में रहा। समर्थकों के लिए वे राजनीतिक उत्तराधिकार और संघर्ष की निरंतरता के प्रतीक हैं, जबकि आलोचकों के लिए विवादास्पद चेहरा। लेकिन 2026 के चुनाव ने यह साफ कर दिया कि मतदाता ने व्यक्तित्व से अधिक मुद्दों को तरजीह दी। बेरोज़गारी, महँगाई, शासन की पारदर्शिता और भविष्य की अनिश्चितता जैसे सवाल निर्णायक बने।
चुनावी माहौल तनावपूर्ण था, लेकिन यह वही चुनाव था जहाँ आम मतदाता ने पहली बार यह महसूस किया कि उसका वोट वास्तविक बदलाव ला सकता है। शहरी इलाकों में मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत ऊँचा रहा, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान शांत लेकिन स्पष्ट संदेश देने वाला था। लंबे समय बाद यह धारणा टूटी कि नतीजे पहले से तय हैं।
दूसरी ओर अवामी लीग के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता-विरोधी थकान रही। लंबे शासन के बाद पार्टी का संवाद दोहराव का शिकार होता दिखा। विकास और स्थिरता का पुराना तर्क अब महँगाई, रोज़गार और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे सवालों के सामने कमजोर पड़ गया। यही वह बिंदु था जहाँ चुनावी नैरेटिव धीरे-धीरे बीएनपी के पक्ष में झुकता चला गया।
इस चुनाव की सबसे निर्णायक भूमिका युवा मतदाताओं ने निभाई। शिक्षा और रोज़गार के बीच बढ़ती खाई, निजी क्षेत्र में सीमित अवसर और जीवन-यापन की बढ़ती लागत ने युवाओं को राजनीतिक रूप से सक्रिय किया। सोशल मीडिया और विश्वविद्यालय परिसरों में बदलाव की माँग खुलकर सामने आई, जिसे बीएनपी ने अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से संबोधित किया।
आर्थिक मोर्चे पर वैश्विक मंदी, मुद्रा दबाव और आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था ने आम नागरिक की जेब पर सीधा असर डाला। गारमेंट सेक्टर की अनिश्चितता, विदेशी ऋण और मुद्रा भंडार को लेकर बढ़ती चिंताओं ने सरकार के प्रति असंतोष को और गहरा किया। बीएनपी ने आर्थिक विकेंद्रीकरण, निवेश और निर्यात विविधीकरण जैसे वादों के जरिए मतदाताओं को भरोसा दिलाने की कोशिश की।
यह चुनाव एक बुनियादी सवाल छोड़ गया—क्या तेज़ विकास लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की कीमत पर होना चाहिए। 2026 का जनादेश इस सवाल का स्पष्ट उत्तर देता है। मतदाता अब केवल भौतिक विकास नहीं, बल्कि अधिकार, पारदर्शिता और जवाबदेही भी चाहता है।
भारत के लिए यह चुनाव रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। सीमा प्रबंधन, व्यापार, कनेक्टिविटी और सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दों पर नई सरकार के साथ संतुलित कूटनीति की आवश्यकता होगी। इसी तरह चीन, अमेरिका और पश्चिमी देशों की बढ़ती दिलचस्पी के बीच बांग्लादेश को बहु-दिशात्मक विदेश नीति अपनानी होगी।
बीएनपी की जीत उम्मीदों से भरी है, लेकिन यह जीत अपने साथ बड़ी जिम्मेदारियाँ भी लेकर आई है। सत्ता में आने के बाद पार्टी को यह साबित करना होगा कि वह बदले की राजनीति से ऊपर उठकर संस्थागत सुधार, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता दे सकती है।
2026 का आम चुनाव बांग्लादेश के इतिहास में इसलिए याद रखा जाएगा क्योंकि इसने यह दिखाया कि लोकतांत्रिक आकांक्षाएँ चाहे कितने समय तक दबाई जाएँ, वे अंततः रास्ता खोज ही लेती हैं। अब यह आने वाला समय तय करेगा कि यह जनादेश लोकतंत्र की मजबूती में बदलता है या फिर एक और खोया हुआ अवसर बनकर रह जाता है।

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