10-मिनट डिलीवरी का अंत: सुविधा, शोषण और भारत की Gig Economy की निर्णायक लड़ाई
भारत की सड़कों पर बीते कुछ वर्षों से एक अनोखी दौड़ चल रही थी। यह दौड़ मेट्रो या हाईवे की नहीं,
बल्कि उन बाइक सवार युवाओं की थी जिनके बैग पर Blinkit, Zepto, Swiggy Instamart और BigBasket Now जैसे ऐप्स के लोगो चमकते थे।उनके मोबाइल स्क्रीन पर एक लाल रंग का टाइमर चलता रहता था—10:00… 09:59… 09:58…। यह केवल समय की गिनती नहीं थी, यह उस दबाव की गिनती थी जिसमें भारत की नई gig economy सांस ले रही थी।
सुविधा का वहम और असली कीमत
शहरी भारत के लिए 10 मिनट में किराना मिलना किसी क्रांति से कम नहीं था। लेकिन इस क्रांति की कीमत उन राइडर्स ने चुकाई जो ट्रैफिक, मौसम और थकान की परवाह किए बिना लगातार दौड़ते रहे।
लेट होने पर इंसेंटिव कटता था, खराब रेटिंग पर ऑर्डर कम हो जाते थे, और एक एक्सीडेंट का मतलब था सिस्टम से बाहर फेंक दिया जाना।
सरकार ने हस्तक्षेप क्यों किया
सरकार को यह समझ में आ गया कि यह मॉडल सड़क सुरक्षा, श्रम अधिकार और मानव गरिमा तीनों के लिए खतरा बन रहा है। इसलिए “10 मिनट की गारंटी” जैसे दावों को हटाने का निर्देश दिया गया।
क्या ये कंपनियाँ बंद हो जाएँगी?
नहीं। यह मॉडल सिर्फ बदलेगा, खत्म नहीं होगा। अब ग्राहक को अनुमानित समय मिलेगा, लेकिन किसी राइडर की जान को दांव पर लगाकर नहीं।
असल लड़ाई किसकी है
यह लड़ाई सुविधा और इंसान के बीच है। तकनीक का उद्देश्य जीवन आसान बनाना होना चाहिए, किसी को मशीन बना देना नहीं।
Gig Workers के लिए अगला भारत
सरकार न्यूनतम कमाई, दुर्घटना बीमा, एल्गोरिदम पर नियंत्रण और कानूनी सुरक्षा की दिशा में आगे बढ़ सकती है। इससे भारत की gig economy ज्यादा इंसानी बनेगी।
10 मिनट डिलीवरी का अंत असल में एक नए सामाजिक समझौते की शुरुआत है — जहाँ सुविधा और सम्मान साथ-साथ चलेंगे।

0 टिप्पणियाँ