Ticker

6/recent/ticker-posts

Ad

BMC चुनाव 2025: ठाकरे परिवार बनाम बीजेपी — क्या उत्तर भारतीय तय करेंगे मुंबई की सत्ता?

BMC चुनाव 2025–26: ठाकरे परिवार बनाम बीजेपी और उत्तर भारतीय वोट का निर्णायक युद्ध

BMC चुनाव 2025–26: ठाकरे परिवार बनाम बीजेपी और उत्तर भारतीय वोट का निर्णायक युद्ध

मुंबई का बृहन्मुंबई महानगरपालिका चुनाव इस बार किसी नगर निकाय का साधारण चुनाव नहीं है।

यह मुंबई के आत्मा, सत्ता, पैसा और पहचान का चुनाव है। बीते दो वर्षों में जिस तरह महाराष्ट्र की राजनीति पलटी है, उसी का सबसे बड़ा और निर्णायक अध्याय अब बीएमसी में लिखा जाने वाला है।

शिवसेना का विभाजन, उद्धव ठाकरे का सत्ता से बाहर होना, एकनाथ शिंदे का मुख्यमंत्री बनना और बीजेपी का मुंबई में कॉर्पोरेट नेटवर्क के साथ गहरा गठजोड़ — इन सबके बीच बीएमसी आख़िरी किला है जिसे ठाकरे परिवार बचाना चाहता है।

इसीलिए आज उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे और आदित्य ठाकरे अचानक एक मंच पर दिखने लगे हैं। यह भावनात्मक पुनर्मिलन नहीं है, यह अस्तित्व की राजनीति है।

मुंबई में सत्ता का मतलब केवल कुर्सी नहीं होता, मुंबई में सत्ता का मतलब पैसे, मीडिया, रियल एस्टेट और नैरेटिव पर नियंत्रण होता है।

बीएमसी का बजट पचास हजार करोड़ रुपये से अधिक है। यह बजट कई राज्यों के बजट से बड़ा है। यह पैसा मुंबई की सड़कों, झुग्गियों, मेट्रो, कोस्टल रोड, स्लम रिडेवलपमेंट और सबसे बढ़कर बिल्डर लॉबी के हाथों से गुजरता है।

जो बीएमसी जीतता है वही तय करता है कि मुंबई किसकी होगी — आम आदमी की या कॉर्पोरेट की।

बीजेपी जानती है कि अगर उसने बीएमसी जीत ली तो महाराष्ट्र की राजनीति हमेशा के लिए बदल जाएगी। दिल्ली पहले से है, केंद्र पहले से है, महाराष्ट्र सरकार उनके पास है और अगर मुंबई भी हाथ आ गई तो विपक्ष की रीढ़ टूट जाएगी।

ठाकरे परिवार इस सच्चाई को सबसे ज़्यादा समझता है। यही वजह है कि आज राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक दूसरे की ओर झुकते दिख रहे हैं।

मराठी अस्मिता की राजनीति ने दशकों तक मुंबई पर राज किया। लेकिन मुंबई बदल चुकी है। आज मुंबई की आबादी में सबसे बड़ा हिस्सा उत्तर भारतीयों का है।

यूपी, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान से आए करोड़ों लोग मुंबई की आर्थिक रीढ़ हैं। टैक्सी ड्राइवर, डिलीवरी बॉय, कंस्ट्रक्शन वर्कर, फैक्ट्री मज़दूर, छोटे दुकानदार — यह शहर इन्हीं पर चलता है।

अब कोई भी पार्टी बीएमसी उत्तर भारतीय वोट के बिना नहीं जीत सकती।

यही वह बिंदु है जहां ठाकरे परिवार को अपनी राजनीति बदलनी पड़ी है। कभी जिन ‘भैयाओं’ पर हमला होता था, आज वही उद्धव ठाकरे के भाषणों में ‘मुंबईकर’ बन चुके हैं।

बीजेपी इस वर्ग को हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि के ज़रिए साधना चाहती है। ठाकरे खेमा इस वर्ग को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि बीजेपी मुंबई को अडानी-अंबानी की निजी कॉलोनी में बदल देगी।

मुंबई का गरीब जानता है कि बीजेपी की नीतियों से बिल्डर और बड़े उद्योगपति तो अमीर होते हैं, लेकिन झुग्गी में रहने वाला वही रहता है।

धारावी, कुर्ला, गोवंडी, मानखुर्द, भांडुप, कांदिवली — इन इलाकों में उत्तर भारतीयों की भारी आबादी है और यही इलाक़े चुनावी गणित बदलते हैं।

राज ठाकरे भी यह समझ चुके हैं कि अगर उन्होंने उत्तर भारतीयों से दुश्मनी बनाए रखी तो उनका राजनीतिक भविष्य खत्म हो जाएगा।

इसलिए अब मनसे की भाषा बदली है। ‘मराठी बनाम भैया’ से ‘मराठी + मुंबईकर’ की तरफ़ रुख़ किया गया है।

बीएमसी चुनाव इस बार दो मॉडलों की लड़ाई है।

एक तरफ बीजेपी का कॉर्पोरेट मुंबई मॉडल है, जहां बड़े प्रोजेक्ट, रियल एस्टेट और ग्लोबल निवेश प्राथमिकता है।

दूसरी तरफ ठाकरे मॉडल है, जहां लोकल रोज़गार, स्लम रिडेवलपमेंट और क्षेत्रीय संतुलन की बात होती है।

उत्तर भारतीय इस लड़ाई के निर्णायक हैं क्योंकि वे इस शहर का श्रमिक वर्ग हैं। वे न तो कॉर्पोरेट हैं, न अमीर हैं, लेकिन संख्या में सबसे ज़्यादा हैं।

जो उन्हें भरोसा दिलाएगा कि उसकी सरकार में उनका जीवन बेहतर होगा, वही बीएमसी जीतेगा।

इसलिए उद्धव ठाकरे आज मंदिरों से लेकर उत्तर भारतीय मोहल्लों तक नज़र आ रहे हैं। राज ठाकरे की भाषा में नरमी है। आदित्य ठाकरे युवा और झुग्गी वोटरों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

बीजेपी के पास पैसा, मशीनरी और केंद्र सरकार है। ठाकरे परिवार के पास भावनात्मक मुंबई और अस्मिता की राजनीति है।

यह चुनाव तय करेगा कि मुंबई भविष्य में किसके हाथ में जाएगी।

अगर बीजेपी जीती, तो मुंबई कॉर्पोरेट इंडिया की राजधानी बनेगी।

अगर ठाकरे जीते, तो मुंबई अभी भी अपने मज़दूरों और आम लोगों की रहेगी।

इसीलिए यह चुनाव साधारण नहीं, ऐतिहासिक है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ