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Avimukteshwaranand and the Clash Between Tradition and Personal Authority

अविमुक्तेश्वरानंद: धर्म की आड़ में निजी अहंकार या राजनीति का मोहरा?

Avimukteshwaranand Controversy

चित्र: अविमुक्तेश्वरानंद और संगम विवाद (सांकेतिक चित्र)

वाराणसी/प्रयागराज: सनातन धर्म में 'शंकराचार्य' का पद सर्वोच्च माना गया है। यह पद त्याग, तपस्या और शास्त्र सम्मत आचरण का प्रतीक है।

Avimukteshwaranand Controversy Aamcharcha
लेकिन पिछले कुछ समय से ज्योतिष पीठ के दावों को लेकर चर्चा में रहने वाले अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बयानों और कृत्यों ने एक नई बहस छेड़ दी है। क्या एक सन्यासी का आचरण ऐसा होना चाहिए जिससे धर्म की जगहंसाई हो? या फिर यह सब 'फुटेज' पाने और अपनी खोई हुई प्रासंगिकता को बचाने का एक सुनियोजित प्रयास है?


अतीत का साया: स्वरूपानंद जी से अविमुक्तेश्वरानंद तक

इस पूरे विवाद की जड़ें इतिहास में छिपी हैं। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के समय, जब पूरा साधु-संत समाज एकजुट होकर भाजपा और संघ के साथ खड़ा था, तब तत्कालीन शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी ने एक अलग राह चुनी थी। राजनीतिक गलियारों में यह सर्वविदित था कि कांग्रेस ने उन्हें अपने पक्ष में रखकर मंदिर आंदोलन में अपनी भूमिका बनाए रखने की कोशिश की थी।

परिणाम यह हुआ कि स्वरूपानंद जी कभी भाजपा और संघ के साथ नहीं आ पाए। समय बदला, देश में भाजपा की सरकारें आईं और आम हिंदुओं के मन में यह भाव घर कर गया कि जो संत कांग्रेस जैसे 'मुस्लिम परस्त' दल के साथ खड़े हैं, वे हिंदुओं के सगे नहीं हो सकते। धीरे-धीरे ऐसे संतों का महत्व आम मानस से कम होता गया। अविमुक्तेश्वरानंद इसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, जहाँ 'अति-महत्वाकांक्षा' और 'उपेक्षा' का मेल उन्हें अमर्यादित आचरण की ओर धकेल रहा है।

"अविमुक्तेश्वरानंद जैसे अतिमहत्वाकांक्षी व्यक्तित्वों को अपनी उपेक्षा या कम सम्मान पच नहीं पाता है। वह कुछ भी करके अपना महत्व और प्रासंगिकता बनाए रखने को लालायित हैं।"

संगम विवाद: हीनभावना का प्रदर्शन

अभी हाल ही में प्रयागराज माघ मेले के दौरान संगम स्नान को लेकर हुआ विवाद इसका ताजा उदाहरण है। नियमों को ताक पर रखकर, प्रशासन से जानबूझकर उलझना और हठधर्मिता दिखाना किसी भी दृष्टि से सन्यासी का लक्षण नहीं है। हालांकि पुलिस की कार्यवाही को पूरी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन इस पूरी परिस्थिति के लिए उकसाने का कार्य स्वयं अविमुक्तेश्वरानंद के आचरण ने किया। यह स्पष्ट रूप से 'विक्टिम कार्ड' खेलने की एक कोशिश नजर आती है।

आम हिंदू और शंकराचार्य: बढ़ती दूरियां

आज का हिंदू समाज बदल चुका है। वह अब किसी मठ या पीठ की जटिल परंपराओं के फेर में नहीं पड़ता। आज का सामान्य हिंदू सीधे अपने इष्ट—राम, कृष्ण और महादेव से जुड़ा है। उसके लिए धर्म का अर्थ 'हर हर महादेव' का जाप है। सूचना के युग में जनता सब समझती है कि कौन धर्म की रक्षा कर रहा है और कौन अपने निजी अहंकार की तुष्टि के लिए भगवा का उपयोग कर रहा है।

क्या यह कांग्रेस की नीति का हिस्सा है?

अविमुक्तेश्वरानंद के निरंतर आते विवादित बयान अनजाने में उसी नीति को खाद-पानी दे रहे हैं, जो हिंदू एकता को खंडित करना चाहती है। जब एक बड़ा संत समाज और सत्ता के विरुद्ध खड़ा होता है, तो उससे दरारें पैदा होती हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि धर्म का उपयोग राजनीतिक विरोध के लिए किया जा रहा है।


बदलते समय की चुनौती: पद बड़ा या आचरण?

शंकराचार्य जैसे गरिमामयी पद पर बैठे व्यक्ति को अपनी वाणी और व्यवहार में संयम रखना चाहिए। यदि आचरण वस्त्र और पद की मर्यादा के अनुरूप न हो, तो जनता का सम्मान खोने में देर नहीं लगती। अविमुक्तेश्वरानंद को यह समझना होगा कि हिंदू समाज अब अंधभक्त नहीं रहा; वह शास्त्रों के साथ-साथ राष्ट्रहित और व्यक्तिगत आचरण की भी समीक्षा करता है। धर्म का उपयोग निजी कुंठाओं को शांत करने के लिए करना अंततः स्वयं की ही हानि है।

टीम आम चर्चा

वेबसाइट: Aamcharcha.com

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