I-PAC और तृणमूल कांग्रेस: जब बंगाल की राजनीति ज़मीन से उठकर डेटा के सर्वर पर पहुँची
पश्चिम बंगाल की राजनीति पिछले एक दशक में केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं रही। यह उस परिवर्तन की कहानी है जिसमें चुनाव लड़ने की शैली, जनमत गढ़ने की तकनीक और सत्ता को बनाए रखने की रणनीति—तीनों का डीएनए बदल चुका है। इस बदलाव के केंद्र में एक नाम बार-बार उभरता है— Indian Political Action Committee यानी I-PAC।
2019 के लोकसभा चुनावों के बाद I-PAC और तृणमूल कांग्रेस का साथ आना किसी साधारण चुनावी समझौते जैसा नहीं था। यह उस राजनीति की शुरुआत थी जिसमें कैडर, आंदोलन और नारों के साथ-साथ डेटा, सर्वे और माइक्रो-मैनेजमेंट को सत्ता का हथियार बनाया गया।
I-PAC धीरे-धीरे तृणमूल कांग्रेस के लिए एक ऐसे बैकएंड सिस्टम में तब्दील हो गया, जो यह तय करने लगा कि कौन-सा मुद्दा उठेगा, किस विधानसभा में कौन-सी भाषा बोलेगी, और किस चेहरे को आगे किया जाएगा।
2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की करारी हार ने यह साबित कर दिया कि ममता बनर्जी की राजनीति अब केवल करिश्मे पर नहीं, बल्कि एक सटीक चुनावी मशीनरी पर टिकी हुई है।
“खेला होबे” कोई अचानक उपजा नारा नहीं था। यह सर्वे, फोकस ग्रुप और वोटर बिहेवियर एनालिसिस से निकला हुआ संदेश था— जो सीधे बंगाली अस्मिता को संबोधित करता था।
2021 की जीत के बाद I-PAC के साथ अनुबंध 2026 तक बढ़ाया जाना इस बात का संकेत था कि तृणमूल कांग्रेस अब इस मॉडल से पीछे हटने वाली नहीं है।
लेकिन जैसे-जैसे I-PAC की भूमिका बढ़ी, वैसे-वैसे “स्क्रिप्टेड राजनीति” का आरोप भी तेज़ हुआ। विरोधियों ने कहा कि लोकतंत्र को कॉरपोरेट मॉडल में बदला जा रहा है, जबकि समर्थकों का तर्क था कि यह राजनीति को पेशेवर बना रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में जब प्रवर्तन निदेशालय ने I-PAC से जुड़े परिसरों पर छापेमारी की, तो इसे केवल कानूनी कार्रवाई मानना कठिन हो गया।
ममता बनर्जी ने सीधा आरोप लगाया कि यह कार्रवाई भ्रष्टाचार की नहीं, बल्कि चुनावी डेटा और रणनीतिक सूचनाएँ हथियाने की कोशिश है। उनके अनुसार, चुनावी डेटा किसी भी पार्टी की राजनीतिक रीढ़ होता है।
आज डेटा केवल आंकड़े नहीं है— यह मतदाताओं की सोच, उनकी प्राथमिकताएँ, और उनके डर-उम्मीद का पूरा नक्शा है।
I-PAC के आलोचक कहते हैं कि यह लोकतंत्र को ब्रांडिंग में बदल रहा है, जबकि समर्थक मानते हैं कि इससे राजनीति ज़्यादा जवाबदेह और परिणाम-उन्मुख बनती है।
पार्टी के भीतर भी असहजता है। पुराना कैडर खुद को हाशिये पर महसूस करता है, लेकिन नेतृत्व मानता है कि अनुभव और डेटा का संतुलन ही जीत की कुंजी है।
I-PAC के संस्थापक प्रशांत किशोर पहले ही कह चुके हैं कि राजनीति अब नारों की नहीं, बल्कि डिटेल्स की लड़ाई बन चुकी है।

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