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प्रयागराज की नौक-झोंक: शंकराचार्य, मेला प्रशासन और बदलता हिन्दू युग | AamCharcha

प्रयागराज की नौक-झोंक: शंकराचार्य, मेला प्रशासन और बदलता हिन्दू युग

AamCharcha विशेष


यह एक घटना नहीं, एक संकेत है

प्रयागराज की धरती ने भारत के आध्यात्मिक इतिहास में जितना देखा है,

उतना शायद ही किसी नगर ने देखा हो। संगम की रेत पर केवल नदियाँ नहीं मिलीं, वहाँ विचार मिले, अहं पिघले और सत्ता नतमस्तक हुई।

मेला प्रशासन और एक कथित शंकराचार्य के बीच हुई नौक-झोंक को केवल प्रोटोकॉल विवाद कहना इस घटना की आत्मा के साथ अन्याय होगा। यह टकराव परंपरा और समय के बीच खड़े संघर्ष का प्रतीक है।

तीर्थ का अर्थ और संत की कसौटी

हिन्दू दर्शन में तीर्थ पर्यटन स्थल नहीं होता। तीर्थ वह स्थान है जहाँ व्यक्ति अपना अहं त्याग कर भीड़ में विलीन होता है। कुंभ और माघ मेला हिन्दू चेतना का लोकतांत्रिक उत्सव हैं।

जब लाखों साधु-संत नियमों का पालन कर रहे हों, तब किसी एक पदधारी का विशेष आग्रह संन्यास नहीं, विशेषाधिकार का विस्तार बन जाता है।

शंकराचार्य परंपरा: नाम बचा है, तत्व खो गया?

आदि शंकराचार्य पदाधिकारी नहीं थे। वे विचारक, योद्धा और समय से टकराने वाले संन्यासी थे। आज अधिकांश मठ अनुष्ठानों में सिमट चुके हैं।

परंपरा जब प्रश्न करना छोड़ दे, तो वह आस्था नहीं, जड़ता बन जाती है।

मेला प्रशासन और समानता का प्रश्न

राज्य जब धर्म का प्रबंधन करता है, तो खतरे भी होते हैं। पर इस प्रकरण में प्रशासन की मूल चिंता समानता और सुरक्षा थी।

समान नियम, समान मार्ग और समान व्यवस्था—यही तीर्थ का मूल स्वभाव है।

राम मंदिर, प्राण-प्रतिष्ठा और असहमति

राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी, वह हिन्दू आत्मविश्वास की पुनर्प्राप्ति थी।

उस क्षण का उपहास असहमति नहीं, समय से कटाव था। असहमति विनम्र होती है, विघ्न नहीं।

पीठ की राजनीति और चेतना का क्षरण

पीठ का सम्मान इतिहास से आता है, पर वैधता हर युग में अर्जित करनी पड़ती है।

जब पीठ समाज की गति से कट जाए, तो वह स्वयं अप्रासंगिक होने लगती है।

ब्राह्मण चेतना और आत्मावलोकन

यह विवाद ब्राह्मण बनाम गैर-ब्राह्मण नहीं है। यह ब्राह्मण चेतना के पुनर्जागरण का संकेत है।

ब्राह्मण परंपरा प्रश्न से जीवित रही है। आज प्रश्न उठना संकट नहीं, स्वास्थ्य का लक्षण है।

हिन्दू समाज का बदलता नेतृत्व

आज हिन्दू समाज नेतृत्व को पद से नहीं, आचरण और संवेदना से पहचान रहा है।

एक साधारण प्रवचनकर्ता जो समाज को जोड़ता है, आज जड़ पीठ से अधिक प्रभावी है।

युग बदल रहा है, प्रश्न हमारे सामने है

यह न किसी व्यक्ति की हार है, न किसी प्रशासन की जीत। यह अहं की पराजय और चेतना का उदय है।

यदि हिन्दू समाज धैर्य और विवेक के साथ खड़ा रहा, तो यह युग स्वर्ण कलश देगा। अन्यथा केवल टूटा हुआ भांड।

यह लेख भाषण नहीं है। यह समय की पुकार है।

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